कसुरबार

अगर हम कोई गुनाह करे
जान बुझ के करे
सोच समझ के करे
तोह हम कसुरबार हैं
और हम ये  क़बूल करे की
हाँ हम क़सूर किया …….

पर जब हम ऐसे कुछ
किया ही नहीं,
हम कुछ गलत
किया ही नहीं,
और उसमे अगर
हमे कोई कसुरबार
का इलज़ाम लगता है
दिल मैं गहरा
ठेस लगता है ………

अजनबी कोई तोह हमे
जानता ही नहीं
तोह उसका बात कुछ
अलग है,
लेकिन जिसे हम
दोस्त मानते हैं
उसके लिए
अपनी जान
निछाबर करते हैं,
उसके लिए
रब से दुआ मांगते हैं,
वही दोस्त अगर
हमपर क़सूर का
लांछन लगाता है,
तोह सचहमुझ
अपनी ज़िन्दगी पे
नफरत आ जाता है ……….

पहले तो तुम सोचा करो
जो दोस्त हमे
इतना इज़्ज़त देता है,
जो दोस्त हमे
हमारा इतना दीदार करता है,
जो दोस्त हमे
हमे बेसुमार प्यार करता है,
जो दोस्त हमे
खुदा मानता है
वो कभी गुनाह
कर ही नहीं सकता
न वो कभी कसुरबार
हो सकता है,
लेकिन उसको न समझपाना
दोस्ती पे लांछन है …….

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