एक पंछी
चाहें कितना भी ऊपर उड़े,
एक हद के बाद
आसमान के निचे उससे
उतरना ही पड़ता है …..
सब पंछी दूर दूर तक
उड़ नहीं पाते,
सब पंछी चील के तरह
बहुत ऊपर अस्समान तक
जा नहीं पाते
पर पास हो या दूर
ज्यादा ऊपर हो या नीचे
उनके निचे आना ही है……
चील चाहे सब पंछियों से
ज्यादा ऊपर आसमान तक
उड़ने का काबिलियत रखता है,
लेकिन उसको आसमान से
नीचे उतरना ही है
रहने के लिए,
क्यों की आसमान कुछ
जगा नहीं देता
थेरने के लिए……..
वैसे हमारा ज़िन्दगी है……
कोई इंसांन चाहे
कितना झूट के आसमान
के ऊपर उड़ता रहे,
लेकिन उससे
सच्चाई की ज़मीन पे
उतरना ही होता है……
क्यों की झूट की आसमान चाहे
कितना बड़ा न हो,
कोई भी इंसान कितना भी
छल के ऊंचाई जाये,
लेकिन उससे फिर से
हक़ीक़त के ज़मीन के
आना ही होता है……
क्यों की सचाई ही
हकीकत है
और झूट हमेसा
झूट ही रहता है
चाहे कोई उसको
कितना भी ढंके
एक दिन सचाई का सूरज
उससे बेनक़ाब
कर ही देता है…….
