मुराद और फरियाद

हम मुरादे लेके ईश्वर के
पास जाते है,
ईश्वर से गुहार लगाते हैं
हमारे मुरादे सफल हो,
ईश्वर को तोह हम
देख नहीं पाते,
फिर भी हम यकीन
करते हैं उन्हें,
उनका मुहं से बात
सुन नहीं पाते,
फिर भी उनपे बहुत
भरोसा जताते हम,
हमारे दिल पे यह उम्मीद
रख बैठते है हम
जरूर ईश्वर पूरा करेंगे
हमारे मुरादों को
जो ईश्वर को मानता है
वो ईश्वर पे हमेसा
आस्था रख ता है……

पर हम जब फरियाद
करते है,
खुदा से भी करते हैं
अपनों से भी करते हैं
दिल पे यही भरोसा लेके की
वो जरूर हमारा
फरियाद सुनेंगे
चाहे खुदा हो
चाहे अपनों हो
लेकिन खुदा को हम
देख नहीं सकते,
सिर्फ अहसास कर
सकते हैं उनपे,
चाहे वो हमारा फरियाद का
कोई जवाब दे या नहीं,
पर अपनों जो हमारा करीब है
जो इंसान कहलात्ते हैं,
ज़ुबान से बात कर सकते हैं
जब वो हमारा फरियाद को
सुनने के बाद भी
खामोश रह जाते हैं
तोह हमारा फरियाद
खामोश हो जाता है
दर्द की घुटन मैं…..

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